गजल
हर जगह बस दीनता- ही- दीनता है
एक भिखारी दूसरे से छीनता है
और क्या वे दे सकेंगे दूसरे को
जिनके भीतर हीनता- ही- हीनता है
लोग कम्बल ओढकर घी पी रहे हैं
और हम कहते इसे शालीनता है
ये जो बगुले हैं दिखायी दे रहे
मछलियों के ही लिए तल्लीनता है
चेतना के स्वर बहुत अस्वस्थ हैं
बस क्षणिक उत्तेजना उद्विग्नता है
तुमने उस लडके को देखा है कभी
सुबह कूड़ों में भी जो कुछ बीनता है
जो छतों पर हैं हमें सीढ़ी बनाकर
क्या उन्हीं के ही लिए स्वाधीनता है
( गजल संग्रह 'तिरंगे के लिए ' में 1997 में प्रकाशित )