लघुकथा संसार
झोले में धोती और लोटा रखा.
हाथ में छड़ी ली.
विदा होने लगे.
मुन्ना सामने आकर खड़ा हो गया.
'कहां जा रहे हो दादा ?'
'मैं घर जा रहा हूँ, मुन्ना.तू मम्मी के पास जा.'
'कौन-सा घर, दादा ? घर तो यही है.'
'नहीं मुन्ना, यह घर मेरा नहीं है ."
"फिर यह किसका घर है, दादा ?"
"यह घर तेरी मम्मी का है ."
" तो क्या हुआ ? रहो न !"
"देखते नहीं हो, तुम्हारी मम्मी कितनी बोलती रहती है ?"
"मम्मी तो मुझे भी डांटती रहती है, मगर प्यार भी तो करती है !"
" नहीं मुन्ना, मेरा यहाँ रहना अब ठीक नहीं है."
"क्यों ठीक नहीं है दादा ?"
" मेरे चलते तुम्हारी मम्मी को बहुत दिक्कत हो रही है."
"मम्मी को दिक्कत क्यों हो रही है, दादा ?"
"मेरे लिए बहुत काम करना पड़ता है, मेरे चलते बहुत खर्च बढ़ गया है. मुझे जाने दो मुन्ना, पापा को बता देना."
मुन्ना दौड़कर मम्मी के पास आया . देखा,मम्मी रो रही है. देह छुआ. गर्म था. फिर दौड़ा.
दादा सड़क पर आ गए थे .
मुन्ना आगे आ गया.
" अभी मत जाओ, दादा. पापा को आने दो, मम्मी को बुखार है."
"बुखार है ?"
"हाँ, मम्मी को बी.पी. हो जाता है तो क्रोध आ जाता है. तब जोर-जोर से बोलने लगती है. फिर बुखार आ जाता है. फिर रोने लगती है ."
दादा ढीले पड़ गए.
" तुम बहुत झूठ बोलते हो, दादा !"
"मैं ?"
" हा, तुमने कहा था कि मेरे बर्थ डे में तुम मुझे ढेर मिठाइयाँ खिलाओगे और अभी जा रहे हो !"
दादा रोने लगे.
पैर आगे बढ़ने से इन्कार करने लगे.
मुन्ना को गोद में उठा लिया.
" मत रोओ दादा, तुम तो कहते थे अच्छे लडके रोते नहीं."
दादा को हँसी आ गई.
मुन्ना नीचे उतर गया.
दादा के हाथ से झोला ले लिया.
मुन्ना आगे-आगे चलने लगा.
दादा मुन्ना के पीछे-पीछे वापस आने लगे.
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