Monday, 1 November 2021

मैं जगा तो

 

                 मैं जगा तो

मैं जगा तो

आज सूर्योदय हुआ

डालियों पर फूल भी खिलने लगे |

मैं जगा तो ये दीवारें

आप ही गिरने लगीं

हाथ की तिरछी लकीरें

आप ही मिटने लगीं

मैं जगा तो

वासना की  धुंध भी हटने लगी

प्रार्थना के दीप मनमें  जलने लगे |

मैं जगा तो मंदिरों के

द्वार भी खुलने लगे

दर्द के पर्वत भी जैसे

खुद-व्-खुद गलने लगे

मैं जगा तो

सामने शबरी हुई

राम भी मुझसे गले मिलने लगे |

मैं जगा तो कृष्ण की भी

बांसुरी बजने लगी

और मेरे पास ही

यमुना नदी बहने लगी

मैं जगा तो

मन भी वृन्दावन हुआ

रास्ते ब्रज के भी हैं दिखने लगे |

( प्रकाशित : शुभतारिका : सितम्बर 1997 )

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