Monday, 1 November 2021

घृणा करूँ किससे

 

घृणा करूँ किससे

 

घृणा करूँ इससे

और किससे प्रेम करूं ?

केवल गुलाब के ही पौधे

हर तरफ दिखाई देते हैं

जिनके तन पर तो कांटें हैं

अनगिनत, मगर

उन काँटों के ही बीच खिले

कुछ फूल बड़े प्यारे-प्यारे |

 

बैठूं किसके पास

या किससे दूर रहूँ ?

सागर का ही पानी केवल

हर तरफ दिखाई देता है

जिसके लहरों के उठने-गिरने

का सौन्दर्य निराला है

पर जो पानी

प्यासे मन को

तृप्ति नहीं दे पाता है |

 

ग्रहण करूं क्या

या फिर किसका त्याग करूँ ?

देखूँ जिधर

उधर मिटटी ही मिटटी है

 हम सब बच्चे है

मिटटी से हैं  खेल रहे

बना घरौंदा

अपने हाथों तोड़ रहे

फिर देख रहे

भींगी पलकों से

 इधर-उधर

शायद, इसका ही नाम

 हमारा जीवन है |

 

( प्रकाशित : शुभतारिका, अक्टूबर  1997 )

No comments:

Post a Comment