घृणा करूँ किससे
घृणा करूँ इससे
और किससे प्रेम करूं ?
केवल गुलाब के ही पौधे
हर तरफ दिखाई देते हैं
जिनके तन पर तो कांटें हैं
अनगिनत, मगर
उन काँटों के ही बीच खिले
कुछ फूल बड़े प्यारे-प्यारे |
बैठूं किसके पास
या किससे दूर रहूँ ?
सागर का ही पानी केवल
हर तरफ दिखाई देता है
जिसके लहरों के उठने-गिरने
का सौन्दर्य निराला है
पर जो पानी
प्यासे मन को
तृप्ति नहीं दे पाता है |
ग्रहण करूं क्या
या फिर किसका त्याग करूँ ?
देखूँ जिधर
उधर मिटटी ही मिटटी है
हम सब बच्चे है
मिटटी से हैं खेल रहे
बना घरौंदा
अपने हाथों तोड़ रहे
फिर देख रहे
भींगी पलकों से
इधर-उधर
शायद, इसका ही नाम
हमारा जीवन है |
( प्रकाशित : शुभतारिका, अक्टूबर 1997 )
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