प्रो. गंगानंद झाजी की चिट्ठी
प्रिय ठाकुरजी,
आपकी याद आई तो इस बांग्ला कविता का अनुवाद भेज रहा हूँ.
आपकी उलझनें किस स्थिति में हैं ?
प्रतीक्षा है.
शुभाकांक्षी
गंगानंद झा
तुम देख लेना --- नीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती
एक - एक कर बना लूँगा, तुम देख लेना
घर-दरबाजा, खेत- खलिहान
आँगन में लौकी का मचान
खिडकी के पास
जूही की लहराती हुई झाड
एक-एक कर सब बनाऊंगा, तुम देख लेना |
दक्षिण की ओर तालाब हो, तो अच्छा रहता है,
तुमने कहा था,
अवश्य रहेगा |
तालाब में हंसों का नहाना देखना चाहती हो,
ऐसी क्या बड़ी बात है,
सफेद और बादामी हंस छोड़ दूँगा |
एक ही बार में शायद न हो,
पर एक-एक कर होगा |
प्यार रहने से सब होता है
देख लेना, सब होगा
जो कुछ भी बनाया जा सकता है,
मैं दो हाथों से
क्रमशः बनाऊंगा, तुम देख लेना |
प्रिय ठाकुरजी,
आपकी याद आई तो इस बांग्ला कविता का अनुवाद भेज रहा हूँ.
आपकी उलझनें किस स्थिति में हैं ?
प्रतीक्षा है.
शुभाकांक्षी
गंगानंद झा
तुम देख लेना --- नीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती
एक - एक कर बना लूँगा, तुम देख लेना
घर-दरबाजा, खेत- खलिहान
आँगन में लौकी का मचान
खिडकी के पास
जूही की लहराती हुई झाड
एक-एक कर सब बनाऊंगा, तुम देख लेना |
दक्षिण की ओर तालाब हो, तो अच्छा रहता है,
तुमने कहा था,
अवश्य रहेगा |
तालाब में हंसों का नहाना देखना चाहती हो,
ऐसी क्या बड़ी बात है,
सफेद और बादामी हंस छोड़ दूँगा |
एक ही बार में शायद न हो,
पर एक-एक कर होगा |
प्यार रहने से सब होता है
देख लेना, सब होगा
जो कुछ भी बनाया जा सकता है,
मैं दो हाथों से
क्रमशः बनाऊंगा, तुम देख लेना |
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