Saturday, 30 October 2021

हम न सुधरेंगे

 

 

 हम न सुधरेंगे

 

तू सुधार जा देश मेरे, हम न सुधरेंगे |

दो कदम आगे बढ़े

दो कदम पीछे मुड़े

सीढ़ियाँ ऊपर चढ़े,फिर

नीचे कुंए में गिरे

तू निकल जा देश मेरे, हम न निकलेंगे |

आदमी को हम हमेशा

पंक्तियों में बांटते

भाइयों का क़त्ल कर हैं

डफलियां ले  नाचते

तू संभल जा देश मेरे, हम न संभलेंगे |

पी लिया है शर्म हमने

कुर्सियों के वास्ते

बन्द कर  डाले है हमने

रौशनी के रास्ते

तू बदल जा देश मेरे,हम न बदलेंगे |

 

(प्रकाशित : नव भारत, 6.9.1997 )

मेरा मन

   मेरा मन  


काजल की कोठरी में मैं

और मेरे साथ मेरा मन |

 

अनगिनत मछलियाँ और कुछ मछेरे

चल रहे हैं साथ-साथ साँझ और सबेरे

मछलियों की कोठरी में मैं

और मेरे साथ मेरा मन |

 

एक ओर पर्वत और एक ओर कूआं

नजर जिधर जाय उधर धूआं-ही-धूआं 

धूएं के आर-पार मैं

और मेरे साथ मेरा मन |

 

मूंद लीं जो आँखें तो नाच उठे कोयल

नाच उठे भौंरे और खिल गए फूल

 

फूलों की टोकरी मे मैं

और मेरे साथ मेरा मन |

 

(   प्रकाशित : अमृत सन्देश, दीपोत्सव अंक 1995  )

 

                               

Friday, 29 October 2021

इसी तरह

                                                                     इसी तरह 


तन कर 

खड़े हो जाते हैं 

कई परिचित चेहरे 

हमारे सामने 

इसी तरह 

प्रत्येक दिन |


कहीं से आकर 

लटक जाती है

एक नंगी तलवार 

हमारे सामने 

इसी तरह 

प्रत्येक दिन |


छोड़ दिए जाते हैं 

शेर-चीतों की तरह 

खूंखार 

कई सवाल 

हमारे सामने 

इसी तरह 

प्रत्येक दिन |


इस निर्जन-वन में 

कौन सुनता है

किसकी फ़रियाद, 

इसीलिए 

करता रहता हूँ 

'हाँँ' की भाषा में 

'नहीं' का अनुवाद 

इसी तरह 

प्रत्येक दिन |


मैं कहता हूँ

 

                    मैं कहता हूँ

मैं कहता हूँ चीज पुरानी घर के अन्दर मत रखो

वो कहती है कौन जानता बादल कब घिर आ जाए |

 

कभी तो बूढ़ी माँ बन जाती डांट-डपट भी करती है

छोटी बहन कभी बन जाती छीन-झपट भी करती है

कभी मित्र बन बातें करती हंसती और हंसाती है

कभी बहाने कोई ढूँढ़कर रोती और रुलाती है


मै कहता हूँ बात पुरानी मन के अन्दर मत रखो

वो कहती है कौन जानता काम वक्त पर आ जाए |


दो युग बीत चुके हैं उनके साथ-साथ चलते-चलते

कितने दिन और कितनी रातें साथ बात करते-करते

मस्त रहा हूँ मैं चलनी में पानी ही भरते-भरते

मगन रही वो चाबल में ही कंकड़ कुछ चुनते-चुनते

 

मैं कहता हूँ दर्द पुराना तन के अन्दर मत रखो

वो कहती है कौन जानता दर्द दवा ही बन जाए |

 

हाय,नहीं पहचान सके हम एक-दूसरे को अब भी

कभी-कभी सोचा करता हूँ बैठ अकेले में अब भी

जीवन के सारे दुख-सुख का जोड़ शून्य ही होता है

पता नहीं फिर क्यों मानव अपनी किस्मत पर रोता है

 

मैं कहता हूँ दृष्टि पुरानी अपने अन्दर मत रखो

वो कहती है कौन जानता कब क्या किसको भा जाए |

 

( प्रकाशित: नवनीत : दीपावली विशेषांक, नवम्बर 1997)

करो प्रेम की बात

                                   करो प्रेम की बात 


करो प्रेम की बात , करो मत बैर जगाने वाली 

करो बात मत इस उपवन में आग लगाने वाली |

यह अपना संसार निराला उपवन-सा, मधुवन-सा 

यहाँ कहां है जगह घृणा का , ईर्ष्या और जलन का 

भूल-चूक   लेनी-देनी  तो   होती   ही  रहती   है 

सुनो आम की बगिया में ये कोयल क्या कहती है 

गीतों में ही छिपी हुई है तन-मन की खुशियाली 

करो बात मत इस उपवन में आग लगाने वाली |

तुम गुलाब के पास खड़े हो कांटे जोड़ रहे हो 

अभी निआरो इन फूलों को,मुंह क्यों मोड़ रहे हो 

झड जाएंगे बात सत्य है पर इतना क्या कम है 

हर लें मन की पीड़ा पल में इतना इनमें दम है 

चलो बुलाते हैं ये पौधे और इनकी हरियाली

 करो बात मत इस उपवन में आग लगाने वाली |

उपवन है यह देश हमारा प्यारा हिन्दुस्तान 

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सब हैं फूल समान 

अंधियारा कम हो धरती पर फैले और प्रकाश 

तुम से हो तों तुम भी थोडा भर दो और प्रकाश 

भरो बात बैरी मन में भी मधु बरसाने वाली 

करो बात मत इस उपवन में आग लगाने वाली |

तुम पहनो तो

 

              तुम पहनो तो

तुम पहनो तो

शब्दों के कुछ

हार गूँथकर लाऊं मैं |

मैंने कोशिश नहीं कभी की

काँटों से बचकर चलने की

साथ तुम्हारा रहा सदा,फिर

रही जरूरत क्या डरने की

काँटों को

चुभ गया था मैं

यह राज तुम्हें बतलाऊं मैं |

आंधी आयी चली गयी कब

मैं सकता हूँ बता नहीं

याद मुझे है सिबा तुम्हारे

और किसी का पता नहीं

भूल गया हूँ

खुद को भी

यह आज तुम्हें बतलाऊँ मैं |

अब चाहूँ तो भी जा सकता

हूँ मैं तुझसे दूर नहीं

पाना कुछ भी खोकर तुझको

है मुझको मंजूर नहीं

बजती है

जो वीणा मन में

आओ तुम्हें सुनाऊं मैं |


( प्रकाशित: दैनिक भास्कर,बिलासपुर, 11.08.1996 )

                  

Thursday, 28 October 2021

बाबा तेरी रचना

                                                             गीत 


जन -जीवन से क्रान्ति-पुष्प  को कभी नहीं झड़ने देगी 

बाबा तेरी रचना तुझको कभी नहीं मरने देगी |


तुमने हल और फाल बनाया कविता का 

खुरपी और कुदाल बनाया कविता का 

अंधरे में जीते लोगों की खातिर 

बोरिया और पुआल बनाया कविता का 


नई पीढियां इस मशाल को कभी नहीं बुझने देगी 

बाबा तेरी रचना तुझको कभी नहीं मरने देगी |


बात पते की' बाबा बटेसर नाथ' बताएंगे 

'पारो' 'बलचनमा' 'दुखमोचन' याद दिलाएंगे 

'नई पौध' और 'बरुण के बेटे' आगे आएँगे 

सभी पुरानी जूतियों का कोरस गाएंगे 

'हजार-हजार बाहों बाली'  हमें नहीं डरने देगी 

बाबा तेरी रचना तुझको कभी नहीं मरने देगी |


यह जो है संसार तुम्हारी रचना का 

यह जो है संस्कार तुम्हारी रचना का 

यह जो है ओंकार तुम्हारी रचना का 

यह जो है जयकार तुम्हारी रचना का 


कभी कलम के सौदागर की दाल नहीं गलने देगी 

बाबा तेरी रचना तुझको कभी नहीं मरने देगी |



दिनकर की कविता

  गीत 

कभी  हिमालय की छोटी-सी लगती है दिनकर की कविता 

पावन गंगाजल-सी कल-कल बहती है दिनकर की कविता |


श्री कृष्ण के चक्र-सुदर्शन -सी लगती  दिनकर की कविता 

शंकर के डमरू-सी डिम-डिम बजती  है दिनकर की कविता |


ब्रह्मा के सुनहले सृष्टि की चर्चा है  दिनकर की कविता

पुरुष   के ऊपर फूलों की  बर्षा   है दिनकर की कविता |


जग की सोयी मानवता को जगा रही दिनकर की कविता 

कंटक-पथ को फूलों से है सजा  रही  दिनकर की कविता |


मानवता का विजय-गान ही गाती  है दिनकर की कविता 

हमें   तिरंगे के  समान  ही  भाती  है  दिनकर की कविता |



सभ्यता बन रही यंत्रणा

                                                   गीत 


आओ बैठ कुछ करें मंत्रणा 

सभ्यता बन रही यंत्रणा  |


सारे परिणाम ऐसे हैं फिक्स हो गये 

अनुबंध-प्रतिबन्ध सभी मिक्स हो गये 

 आज है पवित्र मात्र बंचना |


  स्वतंत्रता की ऐसी ही आंधियां चलीं 

अंधरे मे जैसे हैं लाठियाँ चलीं 

अब कौन दे किसे सांत्वना |


संबंधों का आज  चीड-फाड़ हो गया 

सम्वेदना का तंतु तार-तार हो गया 

अभिशाप बन गयी याचना |


मुट्ठियों में आज कुछ चित्र हैं बचे 

चलो ढूँढ़ते हैं कौन-कहां मित्र हैं बचे 

चलो साध्य की करें साधना 

सभ्यता न बने यंत्रणा |




सहारा ढूँढ़ते हैं

                                                                            गजल 

रोज सहरा में सहारा ढूँढ़ते हैं 

हम समंदर का किनारा ढूँढ़ते हैं 


जो भी मिला देखा बड़ा नाचीज था 

हम मगर उसको दुबारा ढूँढ़ते हैं 


है सबेरा कर्ज में डूबा अभी भी 

हम सफर में हैं सबेरा ढूँढ़ते हैं 


हमने जन्नत का कबाड़ा कर दिया है 

और जन्नत का नजारा ढूँढ़ते हैं 


इन  सितारों ने कहीं खायी कसम है 

और जमी पर हम सितारा ढूँढ़ते हैं 


रोशनी तो कैद उनकी जेब में है 

हम नशेमन में गुजारा ढूँढ़ते हैं 

तन गोरे मन काले हैं

           गजल                 


तन   गोरेे  मन   काले  हैं 

ये   ही    ऊपर   वाले   हैं 


लोकतंत्र    मजबूत    हुआ 

लूट    रहे   घरवाले   हैं 


चोर  घुसे  घर के  अन्दर 

डरे   हुए   घरवाले   हैं 


खड़े   रहो   ये   सोएंगे 

मन्त्रीजी   के   साले  हैं 


आग  सुलगती है अन्दर 

दरवाजे   पर   ताले   हैं 


रो कर  जन  गण मन गाते 

ऐसे  भी   दिलवाले   हैं 

Tuesday, 26 October 2021

ताउम्र दौड़ता रहा

                                                       गजल 

ताउम्र दौड़ता रहा  जल की तलाश  में 

मौजूद था कुआं मेरे घर के ही पास मे 


डरते  थे अँधेरे में  उसे सांप समझ कर 

रस्सी दिखाई दी जब ही देखा प्रकाश में 


खुद  ही  बना  घरौंदा  खुद  तोड़ते  रहे 

अब खेल कौन खेले ये होशो-हवाश  में 


रोना भी क्या  जो वो तुम्हारे पास है नहीं 

तारों को रहने दो यूँ ही मन के अकाश में 


हमने   ही  लगाए  हैं ये  पौधे  बबूल  के 

अब आम कब फलेगा ये बैठे  हैं आस में 




( नीदरलैंड की पत्रिका Amstel Ganga में प्रकाशित )

रात और दिन

                  रात और दिन  (  लघुकथा )


उसने गालियाँ  दीं |

उसने नाक में दांत गड़ा दिया |

उसने बाल पकड़कर  जमीन पर गिरा दिया |

उसने स्टूल फेंका |


सबेरे उसने स्टोव जलाया | उसने पानी चढ़ा दिया |

उसने चाय-पत्ती डाली| | उसने दूध गर्म किया |

उसने  चीनी डाल दी | उसने चाय छान ली |

दोनों ने साथ-साथ चाय पी |

'हरी सब्जी तों नहीं है ?'  उसने पूछा  |

'आलू है न !'

'फिर चोखा ही बना डालो  |' उसने कहा |

दोनों ने एक ही थाली में खाना खाया |

दोनों सो गये |

शाम में दोनों ने मेक-अप किया |

अच्छे-अच्छे कपड़े पहने |

उसने उसकी टाई ठीक की |

उसने उसका आँचल ठीक किया |

दोनों साथ-साथ बाजार चले |

रास्ते में वो मिल गया |

'अरे ! माथे पर निशान कैसे हो गया ?'

' रात में .....वो.....लाइन कट गयी थी | बाथ-रूम से आ रहा था | स्टूल पर गिर गया  |

अच्छा, कभी डेरे पर भी आओ |'

'जरूर आऊंगा |'

दोनों ने मुस्कुराकर नमस्ते की |


( कहानी-लेखन महाविद्यालय,अम्बाला छावनी से प्रकाशित पत्रिका 'शुभ तारिका ' के                                    नवम्बर-दिसम्बर 1996 अंक में प्रकाशित  )



ये मौसम तो देखिए


                  गजल 

 

धूप धूल और ये आंधी का सिलसिला

                                                             गजल 


धूप धूल और ये आंधी का सिलसिला 

हमको विरासत में पूर्वजों से है मिला 


उन मठों से मेरा कोई वास्ता नहीं 

जिनके आस-पास कोई फूल न खिला 


इक आदमी का जिक्र मैंने जब कहीं किया 

उठते सवाल ये कि वो कहाँ था कब मिला 


न तेरा कसूर था न मेरा कसूर था 

मौसम न जाने क्या हमें कहाँ दिया पिला 


हमने तों वो बबूल भी काटे हैं कई बार 

लेकिन है मुसीबत कि वो जड़ से नहीं हिला 


हनुमान है वो शक्ति अपनी भूल गया है 

नहीं तो उसके सामने क्या है कोई किला 


( गजल संग्रह 'तिरंगे के लिए ' मे  1997 मे प्रकाशित )

यहाँ से देखिए जनाब

                                                                         गजल 


यहाँ से  देखिए  जनाब  जागते हुए 

जा   रहे  है  लोग  कहाँ  भागते हुए 


सोने के खजाने के ढेर पर बैठ कर 

उसकी कटी है उम्र भीख मांगते हुए 


वो देवता को आज भी पत्थर है मानता 

पत्थरों  को  देवता   मानते  हुए 


रह-रह के चीख उसकी देती है सुनाई  

परम्परा  के  सर्प  घर में  पालते हुए 


उसके लिए  घडी कोई  शुभ  नहीं  हुई 

जो आज को रहा है कल पे टालते  हुए 


मेरी भी सोच काम उनके आ नहीं सकी

रहेगी  ये  व्यथा  मुझे  भी  सालते  हुए 


( गजल संग्रह 'तिरंगे के लिए ' मे  1997 मे प्रकाशित )

मैं तुम्हारे साथ हूँ

                                                                  गजल 

प्यार  के  दीए  जलाओ  मैं  तुम्हारे  साथ हूँ 
तुम बुलाओ ना  बुलाओ  मैं तुम्हारे साथ हूँ 


अनगिनत  कांटें  भरे हैं  राह में   मालूम है 
राह   काँटों में  बनाओ  मैं  तुम्हारे  साथ हूँ 


आदमी  के बीच  दीवारें  अभी भी हैं बहुत 
तुम जो बुलडोजर चलाओ  मैं तुम्हारे साथ हूँ


आदमी  की दीनता   को दूर   करने के लिए 
तुम अगर फसलें उगाओ  मैं तुम्हारे साथ हूँ 



शर्त मेरी  एक है  बस  साथ चलने  के  लिए 
'वन्दे मातरम् ' गुनगुनाओ  मैं तुम्हारे साथ हूँ 




( गजल संग्रह 'तिरंगे के लिए ' मे  1997  मे  प्रकाशित )

Monday, 25 October 2021

रास्तों में अनगिनत बरगद मिलेंगे

गजल 


जिन्दगी को जब सही मकसद  मिलेंगे 

रास्तों  में   अनगिनत  बरगद   मिलेंगे 


आयेगा, जायेगा, फिर आयेगा मौसम 

तुम  सफर में हो  तुम्हें  रहबर  मिलेंगे 


दीखती  जो  सामने  मंजिल  नहीं है 

सरहदों  के  पार  भी  सरहद  मिलेंगे 


रास्ते  मुझसे  लिपट  जाएंगे खुद ही 

क्या पता ऐसे भी कुछ अवसर मिलेंगे 


तुम जगो, देखो, तो  वो है  पास  तेरे 

मंदिरों  में  हर  जगह  पत्थर मिलेंगे 


( अलीगढ से प्रकाशित पत्रिका 'जर्जर कश्ती ' के अगस्त  1998  अंक  में प्रकाशित )

याद आने के लिए

     गजल 


क्षुद्रता  का  है  घना  जंगल  उगा  

याद आने के लिए अब क्या बचा 


क्या पता किस हाल में कुंती है अब

जिसने मुझको था कभी सूरज कहा 


मांगता है भीख वो जो दर -ब -दर 

उसके  घर  मेहमान  हूँ मैं भी रहा 


उनकी  नजरों में  अभी  चींटी हूँ मैं 

जिनकी खातिर मैं कभी सीढ़ी बना 


झोंपड़ी   पर  फेंक   चिंगारी  हुजूर

पूछते  है  कल  यहाँ था  क्या हुआ 


(अलीगढ से प्रकाशित पत्रिका 'जर्जर कश्ती' के अगस्त  1998  अंक में प्रकाशित )

Sunday, 24 October 2021

हमें बनाना है बलशाली हिन्दुस्तान

                                           हमें बनाना है बलशाली हिन्दुस्तान 


देश हमारा  हम बच्चों को  करता है  आह्वान 

हमें  बनाना  है  अपना  बलशाली हिन्दुस्तान |


                                                 क्षुद्र स्वार्थ के पथ पर भैया नहीं चलेंगे हम 

                                                जाति-धर्म की खातिर भैया नहीं लड़ेंगे हम 

अपनी प्यारी देश भक्ति पर हमको है अभिमान

हमें  बनाना  है अपना  बलशाली    हिन्दुस्तान | 

                                                  पूरी ताकत से, निष्ठा से  हमको आगे बढ़ना है

                                                 अभी हमें तों मीलों यारो मीलों हमको चलना है

राष्ट्र हितैषी लक्ष्य हमारा और यही अभियान 

हमें  बनाना  है अपना  बलशाली  हिन्दुस्तान |

                                                  हमें  अशिक्षा  और  गरीबी  को  है  दूर  भगाना 

                                                 जहां कहीं भी अन्धकार हो ज्योति वहां फैलाना 

हमें  साथियो  हर  चेहरे पर  लाना है मुस्कान 

हमें  बनाना  है अपना  बलशाली  हिन्दुस्तान |

                                                 आओ  बहनें आगे आओ  भैया  आगे  आओ 

                                                 वीर शहीदों के सपनों को पूरा कर दिखलाओ 

भारत माता  के चरणों में कर दो जीवन  दान 

हमें  बनाना  है अपना  बलशाली हिन्दुस्तान |


(कानपुर से प्रकाशित  मासिक पत्रिका 'बाल साहित्य समीक्षा' के फरबरी  1998 अंक  मे प्रकाशित )

मजबूरियां बढती गईं

                   गजल 

इस कदर इंसान की मजबूरियां बढती गईं 

पास हम आते गये और दूरियाँ बढती गईं 

                                      

                                                    है दवा  का भी असर कुछ इस तरह से जिस्म पर 

                                                     स्वस्थ  हम  होते  गये  कमजोरियां  बढती  गईं 


आदमी   की  भी  तरक्की  का  नमूना  देखिए 

खिड़कियाँ खुलती गईं और चोरियां बढती गईं 


                                                    लडके वाले के यहाँ पहुंचे जो लडकी के पिता 

                                                     बात जितनी ही बढ़ी खामोशियाँ बढती गईं 


कश्तियों  से कूद कर  वे जा समंदर में गिरे 

लोग थे घबरा गये और आंधियां बढती गईं  

काँटों का फूल से मिलन

                                                             गीत 

काँटों का

        फूल से मिलन 

              है अजीब ये समीकरण |

                                                         बादल के नाम पर आंधियां चलीं 

                                                         सरसों के खेत में बिजलियाँ गिरीं 


आंसुओं से 

          है भरा चमन 

              है अजीब ये समीकरण |


                                                      खाली  हैं  आज  साधुओं  की   झोलियाँ 

                                                      निकल रहीं तिजोरियों से मात्र गोलियां 

बच्चों के 

         सर पे ये कफन 

               है अजीब ये समीकरण |

                                                        बरगद   के   पेड़  पर   मेढक  चढ़े 

                                                         सूरज की जगह आज काजल उगे 

नाव और 

       नदी का ये चयन 

              है अजीब ये समीकरण |