मैं कहता हूँ
मैं कहता हूँ चीज पुरानी घर
के अन्दर मत रखो
वो कहती है कौन जानता बादल
कब घिर आ जाए |
कभी तो बूढ़ी माँ बन जाती
डांट-डपट भी करती है
छोटी बहन कभी बन जाती
छीन-झपट भी करती है
कभी मित्र बन बातें करती
हंसती और हंसाती है
कभी बहाने कोई ढूँढ़कर रोती
और रुलाती है
मै कहता हूँ बात पुरानी मन
के अन्दर मत रखो
वो कहती है कौन जानता काम
वक्त पर आ जाए |
दो युग बीत चुके हैं उनके
साथ-साथ चलते-चलते
कितने दिन और कितनी रातें
साथ बात करते-करते
मस्त रहा हूँ मैं चलनी में
पानी ही भरते-भरते
मगन रही वो चाबल में ही
कंकड़ कुछ चुनते-चुनते
मैं कहता हूँ दर्द पुराना
तन के अन्दर मत रखो
वो कहती है कौन जानता दर्द
दवा ही बन जाए |
हाय,नहीं पहचान सके हम
एक-दूसरे को अब भी
कभी-कभी सोचा करता हूँ बैठ
अकेले में अब भी
जीवन के सारे दुख-सुख का
जोड़ शून्य ही होता है
पता नहीं फिर क्यों मानव
अपनी किस्मत पर रोता है
मैं कहता हूँ दृष्टि पुरानी
अपने अन्दर मत रखो
वो कहती है कौन जानता कब
क्या किसको भा जाए |
( प्रकाशित: नवनीत :
दीपावली विशेषांक, नवम्बर 1997)