Thursday, 28 October 2021

सहारा ढूँढ़ते हैं

                                                                            गजल 

रोज सहरा में सहारा ढूँढ़ते हैं 

हम समंदर का किनारा ढूँढ़ते हैं 


जो भी मिला देखा बड़ा नाचीज था 

हम मगर उसको दुबारा ढूँढ़ते हैं 


है सबेरा कर्ज में डूबा अभी भी 

हम सफर में हैं सबेरा ढूँढ़ते हैं 


हमने जन्नत का कबाड़ा कर दिया है 

और जन्नत का नजारा ढूँढ़ते हैं 


इन  सितारों ने कहीं खायी कसम है 

और जमी पर हम सितारा ढूँढ़ते हैं 


रोशनी तो कैद उनकी जेब में है 

हम नशेमन में गुजारा ढूँढ़ते हैं 

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