गजल
रोज सहरा में सहारा ढूँढ़ते हैं
हम समंदर का किनारा ढूँढ़ते हैं
जो भी मिला देखा बड़ा नाचीज था
हम मगर उसको दुबारा ढूँढ़ते हैं
है सबेरा कर्ज में डूबा अभी भी
हम सफर में हैं सबेरा ढूँढ़ते हैं
हमने जन्नत का कबाड़ा कर दिया है
और जन्नत का नजारा ढूँढ़ते हैं
इन सितारों ने कहीं खायी कसम है
और जमी पर हम सितारा ढूँढ़ते हैं
रोशनी तो कैद उनकी जेब में है
हम नशेमन में गुजारा ढूँढ़ते हैं
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