गजल
खाने वो खिलाने का ये मौसम तो देखिए
पीने वो पिलाने का ये मौसम तो देखिए
वो लूटता किसी को कोई उसको लूटता
लुटने वो लुटाने का ये मौसम तो देखिए
कन्धों पे एक-दूसरे के चढ़ रहे हैं लोग
चढ़ने वो चढाने का का ये मौसम तो देखिए
सूरज की ओर आज उठ रही हैं उंगलियाँ
सुनने वो सुनाने का का ये मौसम तो देखिए
कीचड़ मे सने हाथ मिल रहे हैं किस तरह
गिरने वो गिराने का ये मौसम तो देखिए
आंधी के लिए वो कोई भूकम्प ला रहे
छिपने वो छिपाने का ये मौसम तो देखिए
किसका मजाल जो उन्हें पर्वत से उतारे
बचने वो बचाने का ये मौसम तो देखिए
( गजल संग्रह 'तिरंगे के लिए' मे 1997 में प्रकाशित )
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