गजल
यहाँ से देखिए जनाब जागते हुए
जा रहे है लोग कहाँ भागते हुए
सोने के खजाने के ढेर पर बैठ कर
उसकी कटी है उम्र भीख मांगते हुए
वो देवता को आज भी पत्थर है मानता
पत्थरों को देवता मानते हुए
रह-रह के चीख उसकी देती है सुनाई
परम्परा के सर्प घर में पालते हुए
उसके लिए घडी कोई शुभ नहीं हुई
जो आज को रहा है कल पे टालते हुए
मेरी भी सोच काम उनके आ नहीं सकी
रहेगी ये व्यथा मुझे भी सालते हुए
( गजल संग्रह 'तिरंगे के लिए ' मे 1997 मे प्रकाशित )
No comments:
Post a Comment