गजल
धूप धूल और ये आंधी का सिलसिला
हमको विरासत में पूर्वजों से है मिला
उन मठों से मेरा कोई वास्ता नहीं
जिनके आस-पास कोई फूल न खिला
इक आदमी का जिक्र मैंने जब कहीं किया
उठते सवाल ये कि वो कहाँ था कब मिला
न तेरा कसूर था न मेरा कसूर था
मौसम न जाने क्या हमें कहाँ दिया पिला
हमने तों वो बबूल भी काटे हैं कई बार
लेकिन है मुसीबत कि वो जड़ से नहीं हिला
हनुमान है वो शक्ति अपनी भूल गया है
नहीं तो उसके सामने क्या है कोई किला
( गजल संग्रह 'तिरंगे के लिए ' मे 1997 मे प्रकाशित )
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