गीत
आओ बैठ कुछ करें मंत्रणा
सभ्यता बन रही यंत्रणा |
सारे परिणाम ऐसे हैं फिक्स हो गये
अनुबंध-प्रतिबन्ध सभी मिक्स हो गये
आज है पवित्र मात्र बंचना |
स्वतंत्रता की ऐसी ही आंधियां चलीं
अंधरे मे जैसे हैं लाठियाँ चलीं
अब कौन दे किसे सांत्वना |
संबंधों का आज चीड-फाड़ हो गया
सम्वेदना का तंतु तार-तार हो गया
अभिशाप बन गयी याचना |
मुट्ठियों में आज कुछ चित्र हैं बचे
चलो ढूँढ़ते हैं कौन-कहां मित्र हैं बचे
चलो साध्य की करें साधना
सभ्यता न बने यंत्रणा |
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