गिरगिट की तरह
मौसम को देख घर से निकलते रहें हैं लोग
गिरगिट की तरह रंग बदलते रहें हैं लोग |
आता है जिन्हें आँखों में धूल झोंकना
उनकी ही वन्दगी में मचलते रहें हैं लोग |
बंदर से हैसियत अभी आगे नहीं गयीं
इस डाल से उस डाल उछलते रहें हैं लोग |
पहले तो बस्तियों को जला डालते हैं वे
फिर हाल पूछने को टहलते रहें हैं लोग |
आँखों मे उनके जो भी हो पानी तो नहीं है
चुटकी में तितलियों को मसलते रहें हैं लोग |
हाथों से सदा पत्थर पैरों से आंधियां
और मुँह से सदा आग उगलते रहें हैं लोग |
सूरज की रौशनी से चमकता है चन्द्रमा
ये जानकर भी क्यों न संभलते रहें हैं लोग |
मौसम को देख घर से निकलते रहें हैं लोग
गिरगिट की तरह रंग बदलते रहें हैं लोग |
आता है जिन्हें आँखों में धूल झोंकना
उनकी ही वन्दगी में मचलते रहें हैं लोग |
बंदर से हैसियत अभी आगे नहीं गयीं
इस डाल से उस डाल उछलते रहें हैं लोग |
पहले तो बस्तियों को जला डालते हैं वे
फिर हाल पूछने को टहलते रहें हैं लोग |
आँखों मे उनके जो भी हो पानी तो नहीं है
चुटकी में तितलियों को मसलते रहें हैं लोग |
हाथों से सदा पत्थर पैरों से आंधियां
और मुँह से सदा आग उगलते रहें हैं लोग |
सूरज की रौशनी से चमकता है चन्द्रमा
ये जानकर भी क्यों न संभलते रहें हैं लोग |
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