Friday, 15 June 2012

गिरगिट की तरह

         गिरगिट की तरह

मौसम को देख घर से निकलते रहें हैं लोग
गिरगिट की तरह रंग बदलते     रहें हैं लोग |



आता है जिन्हें आँखों में धूल झोंकना
उनकी ही वन्दगी में मचलते रहें हैं लोग |



बंदर  से हैसियत अभी आगे नहीं गयीं
इस डाल से उस डाल उछलते रहें हैं लोग |



पहले तो बस्तियों को जला डालते हैं वे
फिर हाल पूछने को टहलते रहें हैं लोग |



आँखों मे उनके जो भी हो पानी तो नहीं है
चुटकी में तितलियों को मसलते रहें हैं लोग |



हाथों से सदा पत्थर पैरों से आंधियां
और मुँह से सदा आग उगलते रहें हैं लोग |



सूरज की रौशनी से चमकता है चन्द्रमा
ये जानकर भी क्यों न संभलते रहें हैं लोग |




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