Monday, 1 November 2021

अच्छी लगती हो

                                                               अच्छी लगती हो


कविता तुम अच्छी लगती हो,

स्वच्छ विचारों की तुम कल-कल

बहती एक नदी लगती हो |


कांटें भरे हुए पथ में भी

तू ने राह बनाना सीखा

पड़े फफोले जब पांवों में

तुमने है मुस्काना सीखा


तूफानों से भी लड़ने को

हरदम कमर कसी लगती हो |


मन्दिर जाकर भीख मांगने 

की भी तूने चाह नहीं की

लोग तार तिल का कर बैठे

पर तूने परवाह नहीं की


तय की तुमने दूरी इतनी

 फिर भी नहीं  थकी लगती हो |


अपनी मिहनत से ही तूने

अपना भाग्य बदल डाला

जहां-जहां कीचड था उसमें

तुमने कमल खिला डाला


हिम्मत की तुम बड़ी धनी हो

और धुन की पक्की लगती हो,

कविता तुम अच्छी लगती हो | 

 

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