Monday, 1 November 2021

कैसे हैं पौधे विकास के

 

कैसे हैं पौधे विकास के

 

कैसे हैं पौधे विकास के

खिलते हैं फूल अविश्वास के |

 

छत पर है फ़ैल गयी

बेल व्यभिचार की

मिट गयी दूरी

आचार अनाचार की

कीचड में पाँव हैं आकाश के |

 

सीढ़ी पर बैठा है

छिपकर सपेरा

उल्लुओं के पाँव तले

 रौंदा सबेरा

बन्द सारे द्वार हैं प्रकाश के |

 

उमड़ते-घुमड़ते

निराशा के बादल

नाच रही मस्ती में

 एक हवा पागल

नाचते हैं मोर सत्यानाश के |

 

 

(प्रकाशित : दैनिक भास्कर, 3 अक्टूबर 1996 )               

 

 

 

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