कैसे हैं पौधे विकास के
कैसे हैं पौधे विकास के
खिलते हैं फूल अविश्वास के
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छत पर है फ़ैल गयी
बेल व्यभिचार की
मिट गयी दूरी
आचार अनाचार की
कीचड में पाँव हैं आकाश के
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सीढ़ी पर बैठा है
छिपकर सपेरा
उल्लुओं के पाँव तले
रौंदा सबेरा
बन्द सारे द्वार हैं प्रकाश
के |
उमड़ते-घुमड़ते
निराशा के बादल
नाच रही मस्ती में
एक हवा पागल
नाचते हैं मोर सत्यानाश के
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(प्रकाशित : दैनिक भास्कर, 3 अक्टूबर 1996 )
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