गजल
गुल ही गुल है खार नहीं है
ऐसा तो संसार नहीं है
अधिकारों से वाकिफ है वो
लेकिन जिम्मेदार नहीं है
यहाँ बुजुर्गों की कीमत है
घर है ये बाजार नहीं है
आज मुल्क में है सब कुछ, पर
गांधी-सा किरदार नहीं है
रफ्ता-रफ्ता पढना खुद को
ख़त है कोई तार नहीं है
प्यार वतन से नहीं है उनको
मुझको उनसे प्यार नहीं है
मुट्ठी खोलो तो दुख भागे
पर कोई तैयार नहीं है
( प्रकाशित : नवनीत, मई 2001 )
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