Friday, 5 November 2021

ऐसा तो संसार नहीं है

                                                                              गजल 

 गुल  ही  गुल है खार नहीं है 
ऐसा   तो   संसार     नहीं  है 


अधिकारों से वाकिफ  है वो 
लेकिन जिम्मेदार नहीं है 


यहाँ बुजुर्गों की कीमत है 
घर है ये बाजार नहीं है 


आज मुल्क में है सब कुछ, पर
गांधी-सा किरदार नहीं है 


रफ्ता-रफ्ता पढना खुद को 
ख़त है  कोई तार नहीं है 


प्यार वतन से नहीं है उनको 
मुझको उनसे प्यार नहीं है  


मुट्ठी खोलो तो दुख भागे 
पर कोई तैयार नहीं है 


                                                           ( प्रकाशित : नवनीत, मई 2001 )


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