Sunday, 7 November 2021

संसार

 लघुकथा                       संसार 


झोले में धोती और लोटा रखा.

हाथ में छड़ी ली.

विदा होने लगे.

मुन्ना सामने आकर खड़ा हो गया.

'कहां जा रहे हो दादा ?'

'मैं घर जा रहा हूँ, मुन्ना.तू मम्मी के पास जा.'

'कौन-सा  घर, दादा ? घर तो यही है.'

'नहीं मुन्ना, यह घर मेरा  नहीं है ."

"फिर यह किसका घर है, दादा ?"

"यह घर तेरी मम्मी का है ."

" तो क्या हुआ ? रहो न !"

"देखते नहीं हो, तुम्हारी मम्मी कितनी बोलती रहती है ?"

"मम्मी तो मुझे भी डांटती रहती है, मगर प्यार भी तो करती है !"

" नहीं मुन्ना, मेरा यहाँ रहना अब ठीक नहीं है."

"क्यों ठीक नहीं है दादा ?"

" मेरे चलते तुम्हारी मम्मी को बहुत दिक्कत हो रही है."

"मम्मी को दिक्कत क्यों हो रही है, दादा ?"

"मेरे लिए बहुत काम करना पड़ता है, मेरे चलते बहुत खर्च बढ़ गया है. मुझे जाने दो मुन्ना, पापा को बता देना."

मुन्ना दौड़कर मम्मी के पास आया . देखा,मम्मी रो रही है. देह छुआ. गर्म था. फिर दौड़ा.

दादा सड़क पर आ गए थे .

मुन्ना आगे आ गया.

" अभी मत जाओ, दादा. पापा को आने दो, मम्मी को बुखार है."

"बुखार है ?"

"हाँ, मम्मी को बी.पी. हो जाता है तो क्रोध आ जाता है. तब जोर-जोर से बोलने लगती है. फिर बुखार आ जाता है. फिर रोने लगती है ."

दादा ढीले पड़ गए.

" तुम बहुत झूठ बोलते हो, दादा !"

"मैं ?"

" हा, तुमने कहा था कि मेरे बर्थ डे में तुम मुझे ढेर मिठाइयाँ खिलाओगे और अभी जा रहे हो !"

दादा रोने लगे.

पैर आगे बढ़ने से इन्कार करने लगे.

मुन्ना को गोद में उठा लिया.

" मत रोओ दादा, तुम तो कहते थे अच्छे लडके रोते नहीं."

दादा को हँसी आ गई.

मुन्ना नीचे उतर गया.

दादा के हाथ से झोला ले लिया.

मुन्ना आगे-आगे चलने लगा.

दादा मुन्ना के पीछे-पीछे वापस आने लगे. 

                          

Friday, 5 November 2021

ऐसा तो संसार नहीं है

                                                                              गजल 

 गुल  ही  गुल है खार नहीं है 
ऐसा   तो   संसार     नहीं  है 


अधिकारों से वाकिफ  है वो 
लेकिन जिम्मेदार नहीं है 


यहाँ बुजुर्गों की कीमत है 
घर है ये बाजार नहीं है 


आज मुल्क में है सब कुछ, पर
गांधी-सा किरदार नहीं है 


रफ्ता-रफ्ता पढना खुद को 
ख़त है  कोई तार नहीं है 


प्यार वतन से नहीं है उनको 
मुझको उनसे प्यार नहीं है  


मुट्ठी खोलो तो दुख भागे 
पर कोई तैयार नहीं है 


                                                           ( प्रकाशित : नवनीत, मई 2001 )


Monday, 1 November 2021

मैं जगा तो

 

                 मैं जगा तो

मैं जगा तो

आज सूर्योदय हुआ

डालियों पर फूल भी खिलने लगे |

मैं जगा तो ये दीवारें

आप ही गिरने लगीं

हाथ की तिरछी लकीरें

आप ही मिटने लगीं

मैं जगा तो

वासना की  धुंध भी हटने लगी

प्रार्थना के दीप मनमें  जलने लगे |

मैं जगा तो मंदिरों के

द्वार भी खुलने लगे

दर्द के पर्वत भी जैसे

खुद-व्-खुद गलने लगे

मैं जगा तो

सामने शबरी हुई

राम भी मुझसे गले मिलने लगे |

मैं जगा तो कृष्ण की भी

बांसुरी बजने लगी

और मेरे पास ही

यमुना नदी बहने लगी

मैं जगा तो

मन भी वृन्दावन हुआ

रास्ते ब्रज के भी हैं दिखने लगे |

( प्रकाशित : शुभतारिका : सितम्बर 1997 )

मालती विचार हो गई

 

 मालती विचार हो गई

 

जंगलों के पार हो गई

मालती विचार हो गई |

 

आगे अँधेरा था

पीछे अँधेरा था

दृष्टि जिधर जाती थी

हंसता सपेरा था

 

देख तार-तार हो गई

मालती विचार हो गई |

 

 

तालाब गहरा था

पानी भी ठहरा था

खुद भी तो गूंगी थी

मल्लाह बहरा था

 

तैर कर किनार हो गई

मालती विचार हो गई |

 

रिश्तों का घेरा था

शास्त्रों का फेरा था

पहरा था अंधों का

हाथ में सबेरा था

 

धुंध से फरार हो गई

मालती विचार हो गई |

( प्रकाशित : शुभतारिका,जुलाई 1997 )

 

कैसे हैं पौधे विकास के

 

कैसे हैं पौधे विकास के

 

कैसे हैं पौधे विकास के

खिलते हैं फूल अविश्वास के |

 

छत पर है फ़ैल गयी

बेल व्यभिचार की

मिट गयी दूरी

आचार अनाचार की

कीचड में पाँव हैं आकाश के |

 

सीढ़ी पर बैठा है

छिपकर सपेरा

उल्लुओं के पाँव तले

 रौंदा सबेरा

बन्द सारे द्वार हैं प्रकाश के |

 

उमड़ते-घुमड़ते

निराशा के बादल

नाच रही मस्ती में

 एक हवा पागल

नाचते हैं मोर सत्यानाश के |

 

 

(प्रकाशित : दैनिक भास्कर, 3 अक्टूबर 1996 )               

 

 

 

घृणा करूँ किससे

 

घृणा करूँ किससे

 

घृणा करूँ इससे

और किससे प्रेम करूं ?

केवल गुलाब के ही पौधे

हर तरफ दिखाई देते हैं

जिनके तन पर तो कांटें हैं

अनगिनत, मगर

उन काँटों के ही बीच खिले

कुछ फूल बड़े प्यारे-प्यारे |

 

बैठूं किसके पास

या किससे दूर रहूँ ?

सागर का ही पानी केवल

हर तरफ दिखाई देता है

जिसके लहरों के उठने-गिरने

का सौन्दर्य निराला है

पर जो पानी

प्यासे मन को

तृप्ति नहीं दे पाता है |

 

ग्रहण करूं क्या

या फिर किसका त्याग करूँ ?

देखूँ जिधर

उधर मिटटी ही मिटटी है

 हम सब बच्चे है

मिटटी से हैं  खेल रहे

बना घरौंदा

अपने हाथों तोड़ रहे

फिर देख रहे

भींगी पलकों से

 इधर-उधर

शायद, इसका ही नाम

 हमारा जीवन है |

 

( प्रकाशित : शुभतारिका, अक्टूबर  1997 )

अच्छी लगती हो

                                                               अच्छी लगती हो


कविता तुम अच्छी लगती हो,

स्वच्छ विचारों की तुम कल-कल

बहती एक नदी लगती हो |


कांटें भरे हुए पथ में भी

तू ने राह बनाना सीखा

पड़े फफोले जब पांवों में

तुमने है मुस्काना सीखा


तूफानों से भी लड़ने को

हरदम कमर कसी लगती हो |


मन्दिर जाकर भीख मांगने 

की भी तूने चाह नहीं की

लोग तार तिल का कर बैठे

पर तूने परवाह नहीं की


तय की तुमने दूरी इतनी

 फिर भी नहीं  थकी लगती हो |


अपनी मिहनत से ही तूने

अपना भाग्य बदल डाला

जहां-जहां कीचड था उसमें

तुमने कमल खिला डाला


हिम्मत की तुम बड़ी धनी हो

और धुन की पक्की लगती हो,

कविता तुम अच्छी लगती हो |