मालती विचार हो गई
जंगलों के पार हो गई
मालती विचार हो गई |
आगे अँधेरा था
पीछे अँधेरा था
दृष्टि जिधर जाती थी
हंसता सपेरा था
देख तार-तार हो गई
मालती विचार हो गई |
तालाब गहरा था
पानी भी ठहरा था
खुद भी तो गूंगी थी
मल्लाह बहरा था
तैर कर किनार हो गई
मालती विचार हो गई |
रिश्तों का घेरा था
शास्त्रों का फेरा था
पहरा था अंधों का
हाथ में सबेरा था
धुंध से फरार हो गई
मालती विचार हो गई |
( प्रकाशित :
शुभतारिका,जुलाई 1997 )
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