Monday, 1 November 2021

मालती विचार हो गई

 

 मालती विचार हो गई

 

जंगलों के पार हो गई

मालती विचार हो गई |

 

आगे अँधेरा था

पीछे अँधेरा था

दृष्टि जिधर जाती थी

हंसता सपेरा था

 

देख तार-तार हो गई

मालती विचार हो गई |

 

 

तालाब गहरा था

पानी भी ठहरा था

खुद भी तो गूंगी थी

मल्लाह बहरा था

 

तैर कर किनार हो गई

मालती विचार हो गई |

 

रिश्तों का घेरा था

शास्त्रों का फेरा था

पहरा था अंधों का

हाथ में सबेरा था

 

धुंध से फरार हो गई

मालती विचार हो गई |

( प्रकाशित : शुभतारिका,जुलाई 1997 )

 

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