Tuesday, 19 June 2012

प्रो. गंगानंद झाजी की चिट्ठी

                                                      प्रो. गंगानंद झाजी की चिट्ठी


    प्रिय ठाकुरजी,

   आपकी याद आई तो इस बांग्ला कविता का अनुवाद भेज रहा हूँ.
   आपकी उलझनें किस स्थिति में हैं ?
   प्रतीक्षा है.
                                             शुभाकांक्षी

                                           गंगानंद झा



                                          तुम देख लेना --- नीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती


एक - एक कर बना लूँगा, तुम देख लेना

घर-दरबाजा, खेत- खलिहान

 आँगन में लौकी का मचान

 खिडकी के पास

जूही की लहराती हुई झाड

एक-एक कर सब बनाऊंगा, तुम देख लेना |

दक्षिण की ओर तालाब हो, तो अच्छा रहता है,

तुमने कहा था,

अवश्य रहेगा |

तालाब में हंसों का नहाना देखना चाहती हो,

ऐसी क्या बड़ी बात है,

सफेद और बादामी हंस छोड़  दूँगा |

एक  ही बार में  शायद न हो,

पर एक-एक कर होगा |

प्यार रहने से सब होता है

देख लेना, सब होगा

जो कुछ भी बनाया जा सकता है,

मैं  दो  हाथों से 

क्रमशः बनाऊंगा, तुम देख लेना |                      

Friday, 15 June 2012

गिरगिट की तरह

         गिरगिट की तरह

मौसम को देख घर से निकलते रहें हैं लोग
गिरगिट की तरह रंग बदलते     रहें हैं लोग |



आता है जिन्हें आँखों में धूल झोंकना
उनकी ही वन्दगी में मचलते रहें हैं लोग |



बंदर  से हैसियत अभी आगे नहीं गयीं
इस डाल से उस डाल उछलते रहें हैं लोग |



पहले तो बस्तियों को जला डालते हैं वे
फिर हाल पूछने को टहलते रहें हैं लोग |



आँखों मे उनके जो भी हो पानी तो नहीं है
चुटकी में तितलियों को मसलते रहें हैं लोग |



हाथों से सदा पत्थर पैरों से आंधियां
और मुँह से सदा आग उगलते रहें हैं लोग |



सूरज की रौशनी से चमकता है चन्द्रमा
ये जानकर भी क्यों न संभलते रहें हैं लोग |




स्वीकार है

                                     स्वीकार है


अपनी इच्छाओं का ही विस्तार है
जिंदगी जैसी भी है   स्वीकार      है |



दीखता है जो हमारे सामने
यह तो अपना ही रचा संसार है |



एक पत्ता सूख डाली से गिरा
और एक आने को भी तैयार है |



है दीया आनंद फूलों ने यहाँ
पत्थरों ने भी किया उपकार है |



चाहकर भी कुछ न दे पाया तुझे
मुझ पे भी मेरा कहाँ अधिकार है |



जिस चिकित्सक ने मुझे चंगा किया
वह भला क्यों आजकल बीमार है |



लोग जो हैं स्वार्थ में अंधे हुए
क्या नहीं उनका कोई उपचार है ?

सवाल दो मुझे

कांटे  दो  मुश्किलें  दो  या बवाल दो मुझे
जो हो बहुत कठिन वही सवाल दो मुझे |



चलना नहीं आता है आँख मूंदकर मुझे
चाहे किसी जमात से निकाल दो मुझे |



जाऊँगा जहाँ मैं वहीँ जन्नत बनाऊंगा
चाहे कोई आकाश या पताल दो मुझे |



दीये नहीं टिकेंगे आँधियों के दौर में
हाथों में कोई अब नई मशाल दो मुझे |



मंदिर भी सलामत रहें मस्जिद भी हमारे
मैं चाहता हूँ देश बे-मिशाल दो मुझे |



वतन से मांगता हूँ मैं वतन के वास्ते
गांधी या भगतसिंह-सा कोई लाल दो मुझे |


तिरंगे के लिए

सपनों की ये कतार तिरंगे के लिए है
मेरे भी मन में प्यार तिरंगे के लिए है |



बहता है पसीना तो आता है मजा और
अपना भी ये उपहार तिरंगे के लिए है |



डूबता सूरज कभी है दीखता नहीं
कांधे पे ये पहाड़ तिरंगे के लिए है |



ईनाम नहीं होता ईमान से बड़ा
अपना भी ये विचार तिरंगे के लिए है |



खुद तोड़ दी सीमाएँ भाषा प्रदेश की
अपना नया संसार तिरंगे के लिए है |



उस सिंधु को भी दोस्त नमस्कार है मेरा
जिसके हृदय में ज्वार तिरंगे के लिए है |

Thursday, 14 June 2012

शौक है मुझे

         
     गजल          
            सुनने का सुनाने का बड़ा शौक है मुझे
           बचपन से ही गाने का बड़ा शौक है मुझे |




         शब्दों का नशा है किसी नशे से कम नहीं
          पीने का पिलाने का बड़ा शौक है मुझे |




          जब रूठता है कोई आता है मजा और
          रूठे को मनाने का बड़ा शौक है मुझे |




         आंधी मे उड़ गया हो किसी का भी अगर घर
         उस घर को बसाने का बड़ा शौक है मुझे |




        अँधेरे में रहे कोई अच्छा नहीं लगता
        दीया भी जलाने का बड़ा शौक है मुझे |




         गिरने से बच गया हूँ मैं कुएँ में कई बार
         औरों को बचाने का बड़ा शौक है मुझे |

 ( गजल संग्रह 'तिरंगे के लिए ' मे  1997  मे  प्रकाशित )