Saturday, 30 October 2021

हम न सुधरेंगे

 

 

 हम न सुधरेंगे

 

तू सुधार जा देश मेरे, हम न सुधरेंगे |

दो कदम आगे बढ़े

दो कदम पीछे मुड़े

सीढ़ियाँ ऊपर चढ़े,फिर

नीचे कुंए में गिरे

तू निकल जा देश मेरे, हम न निकलेंगे |

आदमी को हम हमेशा

पंक्तियों में बांटते

भाइयों का क़त्ल कर हैं

डफलियां ले  नाचते

तू संभल जा देश मेरे, हम न संभलेंगे |

पी लिया है शर्म हमने

कुर्सियों के वास्ते

बन्द कर  डाले है हमने

रौशनी के रास्ते

तू बदल जा देश मेरे,हम न बदलेंगे |

 

(प्रकाशित : नव भारत, 6.9.1997 )

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