हम न सुधरेंगे
तू सुधार जा देश मेरे, हम न
सुधरेंगे |
दो कदम आगे बढ़े
दो कदम पीछे मुड़े
सीढ़ियाँ ऊपर चढ़े,फिर
नीचे कुंए में गिरे
तू निकल जा देश मेरे, हम न
निकलेंगे |
आदमी को हम हमेशा
पंक्तियों में बांटते
भाइयों का क़त्ल कर हैं
डफलियां ले नाचते
तू संभल जा देश मेरे, हम न
संभलेंगे |
पी लिया है शर्म हमने
कुर्सियों के वास्ते
बन्द कर डाले है हमने
रौशनी के रास्ते
तू बदल जा देश मेरे,हम न
बदलेंगे |
(प्रकाशित : नव भारत, 6.9.1997 )
No comments:
Post a Comment