गजल
क्षुद्रता का है घना जंगल उगा
याद आने के लिए अब क्या बचा
क्या पता किस हाल में कुंती है अब
जिसने मुझको था कभी सूरज कहा
मांगता है भीख वो जो दर -ब -दर
उसके घर मेहमान हूँ मैं भी रहा
उनकी नजरों में अभी चींटी हूँ मैं
जिनकी खातिर मैं कभी सीढ़ी बना
झोंपड़ी पर फेंक चिंगारी हुजूर
पूछते है कल यहाँ था क्या हुआ
(अलीगढ से प्रकाशित पत्रिका 'जर्जर कश्ती' के अगस्त 1998 अंक में प्रकाशित )
No comments:
Post a Comment