मेरा मन
काजल की कोठरी में मैं
और मेरे साथ मेरा मन |
अनगिनत मछलियाँ और कुछ मछेरे
चल रहे हैं साथ-साथ साँझ और सबेरे
मछलियों की कोठरी में मैं
और मेरे साथ मेरा मन |
एक ओर पर्वत और एक ओर कूआं
नजर जिधर जाय उधर धूआं-ही-धूआं
धूएं के आर-पार मैं
और मेरे साथ मेरा मन |
मूंद लीं जो आँखें तो नाच उठे कोयल
नाच उठे भौंरे और खिल गए फूल
फूलों की टोकरी मे मैं
और मेरे साथ मेरा मन |
( प्रकाशित : अमृत सन्देश,
दीपोत्सव अंक 1995 )
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