गजल
ताउम्र दौड़ता रहा जल की तलाश में
मौजूद था कुआं मेरे घर के ही पास मे
डरते थे अँधेरे में उसे सांप समझ कर
रस्सी दिखाई दी जब ही देखा प्रकाश में
खुद ही बना घरौंदा खुद तोड़ते रहे
अब खेल कौन खेले ये होशो-हवाश में
रोना भी क्या जो वो तुम्हारे पास है नहीं
तारों को रहने दो यूँ ही मन के अकाश में
हमने ही लगाए हैं ये पौधे बबूल के
अब आम कब फलेगा ये बैठे हैं आस में
( नीदरलैंड की पत्रिका Amstel Ganga में प्रकाशित )
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