Tuesday, 26 October 2021

ताउम्र दौड़ता रहा

                                                       गजल 

ताउम्र दौड़ता रहा  जल की तलाश  में 

मौजूद था कुआं मेरे घर के ही पास मे 


डरते  थे अँधेरे में  उसे सांप समझ कर 

रस्सी दिखाई दी जब ही देखा प्रकाश में 


खुद  ही  बना  घरौंदा  खुद  तोड़ते  रहे 

अब खेल कौन खेले ये होशो-हवाश  में 


रोना भी क्या  जो वो तुम्हारे पास है नहीं 

तारों को रहने दो यूँ ही मन के अकाश में 


हमने   ही  लगाए  हैं ये  पौधे  बबूल  के 

अब आम कब फलेगा ये बैठे  हैं आस में 




( नीदरलैंड की पत्रिका Amstel Ganga में प्रकाशित )

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