गीत
कभी हिमालय की छोटी-सी लगती है दिनकर की कविता
पावन गंगाजल-सी कल-कल बहती है दिनकर की कविता |
श्री कृष्ण के चक्र-सुदर्शन -सी लगती दिनकर की कविता
शंकर के डमरू-सी डिम-डिम बजती है दिनकर की कविता |
ब्रह्मा के सुनहले सृष्टि की चर्चा है दिनकर की कविता
पुरुष के ऊपर फूलों की बर्षा है दिनकर की कविता |
जग की सोयी मानवता को जगा रही दिनकर की कविता
कंटक-पथ को फूलों से है सजा रही दिनकर की कविता |
मानवता का विजय-गान ही गाती है दिनकर की कविता
हमें तिरंगे के समान ही भाती है दिनकर की कविता |
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