रात और दिन ( लघुकथा )
उसने गालियाँ दीं |
उसने नाक में दांत गड़ा दिया |
उसने बाल पकड़कर जमीन पर गिरा दिया |
उसने स्टूल फेंका |
सबेरे उसने स्टोव जलाया | उसने पानी चढ़ा दिया |
उसने चाय-पत्ती डाली| | उसने दूध गर्म किया |
उसने चीनी डाल दी | उसने चाय छान ली |
दोनों ने साथ-साथ चाय पी |
'हरी सब्जी तों नहीं है ?' उसने पूछा |
'आलू है न !'
'फिर चोखा ही बना डालो |' उसने कहा |
दोनों ने एक ही थाली में खाना खाया |
दोनों सो गये |
शाम में दोनों ने मेक-अप किया |
अच्छे-अच्छे कपड़े पहने |
उसने उसकी टाई ठीक की |
उसने उसका आँचल ठीक किया |
दोनों साथ-साथ बाजार चले |
रास्ते में वो मिल गया |
'अरे ! माथे पर निशान कैसे हो गया ?'
' रात में .....वो.....लाइन कट गयी थी | बाथ-रूम से आ रहा था | स्टूल पर गिर गया |
अच्छा, कभी डेरे पर भी आओ |'
'जरूर आऊंगा |'
दोनों ने मुस्कुराकर नमस्ते की |
( कहानी-लेखन महाविद्यालय,अम्बाला छावनी से प्रकाशित पत्रिका 'शुभ तारिका ' के नवम्बर-दिसम्बर 1996 अंक में प्रकाशित )
No comments:
Post a Comment