Friday, 29 October 2021

तुम पहनो तो

 

              तुम पहनो तो

तुम पहनो तो

शब्दों के कुछ

हार गूँथकर लाऊं मैं |

मैंने कोशिश नहीं कभी की

काँटों से बचकर चलने की

साथ तुम्हारा रहा सदा,फिर

रही जरूरत क्या डरने की

काँटों को

चुभ गया था मैं

यह राज तुम्हें बतलाऊं मैं |

आंधी आयी चली गयी कब

मैं सकता हूँ बता नहीं

याद मुझे है सिबा तुम्हारे

और किसी का पता नहीं

भूल गया हूँ

खुद को भी

यह आज तुम्हें बतलाऊँ मैं |

अब चाहूँ तो भी जा सकता

हूँ मैं तुझसे दूर नहीं

पाना कुछ भी खोकर तुझको

है मुझको मंजूर नहीं

बजती है

जो वीणा मन में

आओ तुम्हें सुनाऊं मैं |


( प्रकाशित: दैनिक भास्कर,बिलासपुर, 11.08.1996 )

                  

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